साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व मोघ नारायण देव ने शुरू की थी माता की पूजा अर्चना
पवन कुमार बरनवाल
धनवार नगर पंचायत स्थित चैती दुर्गा मंदिर में बीते तीन सौ वर्षों से पूर्व से माता की प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना की जा रही है। इस्टेट के तत्कालीन महाराज मोध नारायण देव द्वारा यहां पर माता की प्रतिमा की स्थापना कर पूजा अर्चना शुरू की गई जो आज भी की जा रही है । यहां पर लगने वाले भव्य मेला में धनवार प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु भक्त आते हैं तथा माता का आशीर्वाद लेते हैं ।
कब शुरू हुई पूजा
वर्तमान कर्ता धर्ता अखिलेश्वरी प्रसाद नारायण देव उर्फ श्री बाबू एवं श्री कामेश्वरी प्रसाद नारायण देव उर्फ पप्पू बाबू ने बताया कि आजादी से लगभग सवा तीन सौ साल पहले मोध नारायण देव धनवार आए थे। उसी समय से चैत्र मास में माता रानी की पूजा अर्चना शुरू हुई है। महाराजा एवं स्वजनों द्वारा 1952 तक लगातार माता का पूजा अर्चना किया जाता रहा । बताया कि पूजा कि शुरुआत मोध नारायण देव द्वारा किया गया था तथा उनके बाद क्रमशः गिरिवर प्रसाद नारायण देव , खेम बहादुर नारायण देव , रणबहादुर नारायण देव , ईश्वरी प्रसाद नारायण देव , अंतिम महाराजा के रूप में माहेश्वरी प्रसाद नारायण देव रहे जिन्होंने माता की पूजा अर्चना की थी । राजा माहेश्वरी नारायण देव के राज को बिहार सरकार में ले लिए जाने के बाद उन्होंने माता से क्षमा याचना करते हुए प्रतिमा की स्थापना एवं पूजन कार्य बंद दिया। ग्यारह साल लगातार पूजा नहीं होने के बाद क्षेत्र में विभिन्न तरह की विपदाएं आनी शुरू हो गई । जब महाराजा ने माता से इस समस्या से निदान के लिए अनुनय विनय किया तो माता द्वारा उन्हे सपना देकर पुनः पूजा अर्चना शुरू करने का आदेश दिया ।माता के आदेश के बाद 1964 में उमेश्वरी प्रसाद नारायण देव उर्फ ललन बाबू एवं उनके छोटे भाई सुरेश्वरी प्रसाद नारायण देव उर्फ बबन बाबू के द्वारा माता रानी की पूजा अर्चना शुरू की गई । पूजा शुरू होने के बाद से धीरे धीरे क्षेत्र से प्राकृतिक विपदाएं समाप्त हो गई तथा तब से लेकर आज तक लगातार चैत्र मास में माता रानी की पूरे धूम धाम से पूजा अर्चना की जा रही है ।
श्रद्धालु भक्तों की मनोकामना पूरी करती है माता रानी
उस समय से यहां मेला का आयोजन भी किया जाता है जिसमें धनवार क्षेत्र के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों से श्रद्धालु भक्त पूजा अर्चना कर माता का आशीर्वाद लेने तथा अपनी मन्नते मांगने आते हैं । जो भी श्रद्धालु भक्त स्वच्छ मन से मन्नते मांगते है वह माता रानी पूरी करती हैं ।
कोलकाता से आते हैं मूर्तिकार
माता की प्रतिमा का निर्माण कोलकाता के बाकुंडा से मूर्तिकार आकर किया करते थे और आज भी माता रानी की प्रतिमा का निर्माण उन्हीं के वंशज द्वारा माता की भव्य प्रतिमा बना रहे हैं ।
वर्षो से चला आ रहा बलि प्रथा
पूर्व में माता को प्रसन्न करने के लिए यहां भैसा का बलि दिया जाता था परंतु कालांतर में यह बंद हो गया तथा बाद में यहां बकरे की बलि दी जाने लगी ।
माता के आशीर्वाद से नदी का हुआ है उद्भव
किंदवंती है कि जब महाराज अपना राज पाट चला रहे थे उस वक्त भयानक अकाल पड़ा था तथा पशु पक्षी मरने लगे तो तत्कालीन महाराज ने माता रानी से इस विपदा से समस्त प्रजा को छुटकारा दिलाने की प्रार्थना की । माता की कृपा से धनवार से लगभग पांच किलोमीटर दूर उत्तर की ओर पर एक जलस्रोत का उद्भव हुआ तथा वह नदी के रूप में बहते हुए इरगा नदी में जाकर मिल गया । यह नदी भीषण गर्मी में भी नही सूखती है तथा इसका लाभ सैकड़ों लोग उठाते हैं । आज इसी नदी पर नौलखा डैम का निर्माण किया जा चुका है ।
